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sed quia non numquam eius modi tempora.

Arjun MundaAbout Arjun Munda
अर्जुन मुंडा: एक अनूठा व्यक्तित्व

जमशेदपुर के निकट खारंगाझार के एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे श्री अर्जुन मुंडा असाधारण प्रतिभा के धनी हैं. एक लोकप्रिय कहावत है..  “..होनहार वीरवान के होत चिकने पात..” तो यह कहना कि अर्जुन मुंडा जी पर यह बात पूरी तरह से लागू होती है कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. अपने स्कूली जीवन के दिनों से ही जब अधिकांश बच्चे खेल-कूद और अन्य क्रीड़ायों व आत्मकेंद्रित गतिविधियों में लगे रहते हैं श्री मुंडा जी का खिंचाव समाज के उपेक्षित वर्गों के समस्याओं की तरफ होने लगा था. धर्म, नैतिकता, और ऊँचे संस्कारों की जो बातें जो उन्होंने अपने घर-परिवार में सीखीं थे वे वास्तविकता के धरातल पर बिल्कुल खोखले लगने लगे थे. कुशाग्र व तीक्ष्ण बुद्धिवाले श्री मुंडा जी को समाज की कुरूपता और उसका कलुषित सत्य उद्वेलित करने लगा था. उन्होंने देखा कि वर्गों एवं जातियों के बीच ऊँच-नीच की विषमता ने पारस्परिक सौहाद्र के स्थान पर एक वैमनस्य का वातावरण बना रखा था. यह जान-समझकर कि जनजातीय समाज के लोगों की स्थिति और भी अधिक असम्मानजनक एवं अत्यंत दयनीय थी वे विह्वल हो उठे थे. जल्द ही वे जाति, धर्म में बंटे सामाजिक परिवेश की अंधी गलियों का गणित और उसके ताने-बाने  का जटिल अल्गोरिदम की गुत्थियों को सुलझाने में सफल हुए और किशोरावस्था में ही समाज के दलित, शोषित, और उपेक्षित वर्गों के उत्थान के लिए जीवनपर्यंत एक प्रतिबध्ध सेवक की तरह कार्य करने का कठोर प्रण ले लिया. उस चट्टानी संकल्प के अप्रतिम शक्ति ने उनके व्यक्तित्व को सजाया-संवारा और उनके समर्पण और लोकसेवा ने सोने पे सुहागा का काम किया. उन दिनों झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) एक अलग जनजातीय प्रदेश के लिए जन-आन्दोलन चला रहा था. श्री मुंडा जी को उस आन्दोलन में सामाजिक उत्थान और परिवर्तन की संभावनाएं दिखीं. वे एक साधारण कार्यकर्ता के हैसियत से झारखंड आंदोलन से जुड़ गए. शीघ्र ही उनके निस्वार्थ और जन उपयोगी गतिविधियों और चिंतन की ख्याति पूरे क्षेत्र में फैलने लगी. उनके असाधारण नेतृत्व क्षमता ने आन्दोलन के बड़े नेताओं का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया और पार्टी कैडर में उनका ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर उठा. एक कुशल जन-नेता के गुणों से परिपूर्ण होने के कारण पार्टी को उनमें आन्दोलन को आगे ले जानेवाला एक सक्षम स्तंभ दिखा और पार्टी ने उन्हें 1995 के चुनाव में खरसावां विधान-सभा क्षेत्र से अपना प्रतिनिधि बनाने का निर्णय लिया. श्री मुंडा जी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की और बिहार विधान-सभा में अपने क्षेत्र के विकास और लोगों के समस्याओं को मजबूती के रखा. उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. समय के साथ उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गयी. उन्होंने झारखंड विधानसभा में खरसावां का विधायक रहते हुए एक मंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपना योगदान दिया और जमशेदपुर से सांसद चुनकर लोकसभा में भी अपनी पहचान बनाई और अपनी पार्टी बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव की भारी-भरकम जिम्मेवारी भी निभाई.

परन्तु इतनी सारी उपलब्धियों और सम्मानित पदों को सुशोभित करने के उपरान्त भी श्री मुंडा जी अत्यंत सरल और सहज प्रतीत होते हैं. वैसे तो वे एक स्वाभिमान और आत्मविश्वास से लबालब भरे व्यक्तित्व के स्वामी हैं पर अहंकार और दंभ ने उन्हें छुआ तक नहीं है. आडम्बर और बड़बोलेपन से कोसों दूर श्री मुंडा जी का व्यव्हार सबों के प्रति बहुत ही आत्मीय और सम्मानजनक है जो दिल को छू लेती है. राजनीतिक हलकों में उनकी छवि एक श्रेष्ट और दक्ष कूटनीतिज्ञ की है जिसके कारण उनके सहयोगी और अनुयायी सामान रूप से उनका आदर और अनुसरण करते हैं.

श्री मुंडा जी स्वभाव से एक आदर्श पारिवारिक व्यक्ति हैं. अपनी माँ का ध्यान रखनेवाला सपूत, स्नेहमय पति, और अपने बच्चों से बेइंतिहा प्यार करनेवाला पिता श्री अर्जुन मुंडा अपने भाई-बहनों के भी लाडले हैं. अपने सगे-सम्बन्धियों के लिए हमेशा चिंतित रहना और उनके सुख-दुःख में अपने व्यस्तताओं के बावजूद हमेशा खड़े रहना उनके निर्मल चरित्र और उत्कृष्ट घरेलुपन का एक अप्रतिम उदाहरण है.

अपनी दूरगामी सोच और जन-कल्याणकारी योजनाओं के कारण प्रदेश के लोगों ने श्री अर्जुन मुंडा जी को “झारखंड का विकास पुरुष” के उपाधि से अलंकृत किया है. श्री मुंडा वैसे तो पूरे प्रदेश के विकास और उत्थान की चिंता करते हैं परन्तु गुणवत्तायुक्त, समावेशी शिक्षा और स्वास्थ्य कार्यक्रमों के द्वारा सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के वह प्रचंड समर्थक हैं और उन क्षेत्रों में उत्कृष्ट आधारभूत संरचना के विकास के पुरजोर हिमायती भी. उनका स्वप्न झारखंड को शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए एक उल्लेख बिंदु की तरह विकसित करने की है.

भारत माता के एक सच्चे भक्त श्री मुंडा जी की हठ अपने हृदय में वर्षों से सींचे और संजोये एक ऐसे शिक्षित, समृद्ध, और विकसित भारत की है जहाँ नागरिकों को जीवन के सभी क्षेत्रों में पूरी स्वंतंत्रता और समान अधिकार मिले. एक ऐसा भारत जो अपने नैतिक मूल्यों, चारित्रिक दृढ़ता, और गंगा-जमुनी सामाजिक विरासत के मजबूत स्तंभों पर गर्व से खड़ा हो; एक ऐसा शिक्षित और स्वस्थ भारत जो विकास के लिए समेकित और पर्यावरण के अनुकूल कार्यक्रमों को अपनाये; एक ऐसा भारत जो परंपरा और आधुनिकता का मधुर संगम हो और जो हमारे ऋषि मुनियों की कालातीत सांस्कृतिक विरासत को गर्व से सहेजे-संजोये और साथ ही विज्ञानं और प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में नवीनतम शिल्प और साधनों का आविष्कार-विकास करके भारत के ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को विश्व के प्रतिष्ठित देशों की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दे. श्री अर्जुन मुंडा उस दिवास्वप्न को साकार करने ले लिए आजीवन कटिबद्ध हैं और झारखंड को उस स्वप्निल, नैसर्गिक भारत के एक अभिन्न अंग के रूप में देखने के लिए सर्वदा प्रतिबद्ध और लालायित.

 अर्जुन मुंडा: एक असाधारण राजनीतिज्ञ

श्री अर्जुन मुंडा का राजनीति में प्रवेश किशोरावस्था में ही हो गया था. समाज के शोषित, दलित, एवं जनजातीय समुदाय के लोगों की दुर्दशा देखकर उनके हृदय में क्षोभ भी था और सामाजिक पद्धति, परम्पराओं, और मान्यताओं के प्रति युवा क्रोध भी. उस समय झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) एक अलग जनजातीय प्रदेश के लिए जन आन्दोलन चला रहा था. श्री मुन्डा जी को उस आंदोलन में एक राह दिखी जो दबे-कुचले लोगों को उनकी समस्याओं से निजात दिला सकता था. वे एक कार्यकर्ता के रूप में जेएमएम में शामिल हो गए और आंदोलन को मजबूत करने और आगे बढ़ाने का कार्य बड़ी शिद्दत से करने लगे. उनका सरल स्वभाव, लोगों से सहज संवाद करने का हुनर, और अनोखी संगठन क्षमता ने उन्हें जल्द ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब ला दिया. उनकी बढ़ती लोकप्रियता और पैनी राजनीतिक समझ का आदर करते हुए पार्टी ने उन्हें 1995 के विधानसभा चुनावों में खरसावां से अपना प्रत्याशी बनाया जिसमें श्री अर्जुन मुंडा की भारी जीत हुई. वे चुनकर बिहार विधानसभा गए और अपने क्षेत्र के प्रासंगिक मामलों और लोगों की समस्याओं को मजबूती से उठाया.

दुर्भाग्यवश देश में उन दिनों एक अभूतपूर्व राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण व्याप्त था. 1996 के चुनावों में जनता ने किसी भी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया था. लगभग तीनेक वर्षों तक यह सिलसिला चला और देश में एक अजीब-सी असमंजस की स्थिति बनी रही. कई पार्टियों और गठबंधनों ने अपना भाग्य आजमाया पर डावांडोल व उहापोह से निजात 1999 में जाकर मिली जब श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में दो दर्जनों से भी अधिक दलों ने अपना विश्वास प्रकट किया और बीजेपी की अगुवाई में एनडीए सरकार का गठन हुआ. वाजपेयी जी के अनूठे व्यक्तित्व और उनकी सबको साथ लेकर चलने की अदभुत क्षमता ने देश में फिर से राजनीतिक स्थिरता बहाल की और सरकार ने 2004 तक अपने पांच साल का कार्यकाल बखूबी पूरा किया परन्तु जनता ने अगले चुनावों में कांग्रेस को फिर से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में चुना और श्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने गठबंधन की सरकार बनाई जिसने अगले दस वर्षों तक देश पर शासन किया.

1990–2000 दशक के उत्तरार्ध में व्याप्त राजनीतिक अनिश्चितता के वातावरण ने झारखंड के भविष्य पर भी एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया था. बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री लालू प्रसाद यादव की जेएमएम समर्थित सरकार ने झारखंड के स्थापना के लिए अपने पूर्व अनुमोदन को वापस ले लिया था. इधर जेएमएम की सत्तालोलुपता और उनके चारित्रिक दोमुंहेपन के कारण झारखंड निर्माण की संभावनाओं के जोख़िम में पड़ने का भारी खतरा था. जेएमएम के कन्फ्यूजियाये और स्वार्थपूर्ण रवैये के कारण श्री मुंडा जी का पार्टी संबंधित तिलिस्म पूरी तरह टूट चुका था. अपने मोहभंग के बाद शीघ्र ही उन्होंने पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया क्योंकि उन्हें बीजेपी झारखंड सहित तीन नए राज्यों के निर्माण के प्रति वचनबद्ध प्रतीत हुआ और उनके समर्थन में प्रबलता से मुखर भी. बीजेपी ने अपने मैनिफेस्टो में भी ने यह स्पष्ट किया था कि सत्ता में आने पर वे जल्द ही नए राज्यों का निर्माण कर जनता को दिए गए अपने वचन को पूरा करेंगे.

एनडीए सरकार ने अपना वादा निभाया और सत्ता में आने के लगभग एक वर्ष के भीतर नवम्बर 2000 में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के साथ झारखंड को भारतीय संघ के तीन नए राज्यों के रूप में घोषित किया. झारखंड में श्री बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में बीजेपी ने अन्य समान विचारोंवाले दलों के साथ मिलकर पहली सरकार बनाई. श्री अर्जुन मुंडा जी को कल्याण मंत्री बनाया गया. वैसे तो कल्याण विभाग को ज्यादा आकर्षक या महत्वपूर्ण नहीं माना जाता है परन्तु श्री मुंडा जी ने अपनी नई जिम्मेवारी को एक अनूठा अवसर और ईश्वरीय वरदान की तरह लिया और बिना कोई समय गंवाए झारखंड के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के अपने संजोये सपने को अमली-जामा पहनाने की योजना पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया. उनकी जन-केन्द्रित सोच पर आधारित योजनाओं ने जल्द ही लोगों के जीवन पर अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया. उनकी सकारात्मक राजनीति और लोकोपयोगी कार्यों से मंत्री-परिषद् के अन्य सदस्यों एवं साथी विधायकों के बीच उनकी शाख बढ़ने लगी और आम जनता में उनके नेतृत्व-क्षमता के प्रति विश्वास बढ़ाने का काम किया. शायद इन्हीं कारणों से मार्च 2003 में जब स्थानीय नीति के प्रश्न पर मरांडी सरकार का पतन हुआ तो श्री अर्जुन मुंडा जी गठबंधन के सर्वमान्य नेता बनकर उभरे और 35 वर्ष की अल्पायु में झारखंड के दुसरे मुख्यमंत्री के रूप में पद और गोपनीयता की शपथ ली.

तीन वर्षों के अन्दर प्रदेश के कल्याण मंत्री से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का विलक्षण सफ़र एक ऐसे असाधारण प्रतिभा और नेतृत्व-क्षमता के धनी नेता का खांका खींचती है जिसके पास प्रदेश के समेकित विकास की तीक्ष्ण दूरदृष्टि थी और गठबंधन की कठिनाईयों के वावजूद एक समृद्ध एवं शिक्षित झारखंड के सपने को  साकार करने की दृढ़ हठधर्मिता भी.

मुख्यमंत्री बनने से श्री मुंडा जी का कैनवास अब काफ़ी बड़ा हो गया था. वे अब पूरे प्रदेश के सम्यक विकास और सकारात्मक परिवर्तन की योजना बनाने में लग गए. प्रदेश के आमूल औद्योगिक बदलाव की योजना के अंतर्गत अनेकों भारतीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ आरंभिक समझौते किये गए. लोगों के जीवन-स्तर में सुधार और रोजगार-सृजन से लाखों युवाओं को सबल, सक्षम बनाने के उद्देश्य से 2 और 3 वर्ष के ऐसे पाठ्यक्रमों और प्रशिक्षण की व्यवस्था की नींव रखी गयी जो राज्य में उद्योग लगानेवाली कंपनियों के लिए उनके आवश्यकतानुसार प्रशिक्षित मानव संसाधन मुहैया कराता. परिणामस्वरूप जहाँ एक ओर उद्योगों को उनके मन-मुताबिक स्थानीय कर्मचारी व श्रमिक उपलब्ध हो जाते वहीँ दूसरी ओर रोजगार के नए अवसरों से हमारे हज़ारों युवाओं के आमदनी और आत्मविश्वास में इज़ाफा होता और पूरे प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक सूरत बदलने की एक अच्छी शुरुआत होती. परन्तु श्री मुंडाजी के योजनाओं को तो जैसे किसी की बुरी नज़र लग गयी और प्रदेश के लिए संजोये उनके सारे स्वप्न व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और गठबंधन की राजनीति के भेंट चढ़ गये.

यह निर्विवादित सत्य है कि एक सफल और सबल नेता अपने चिंतन और विचारों से जाना जाता है. अपने समर्थकों और आम जनता के आशाओं और उम्मीदों की कसौटी पर खरा उतरना ही उसकी सही पहचान है. श्री अर्जुन मुंडा की दृष्टि बिलकुल साफ़ है और उनके हौसले हमेशा बुलंद. झारखंड को एक शिक्षित, स्वस्थ, और समृद्ध प्रदेश बनाने के सपने के प्रति उनका समर्पण अडिग है और उनकी प्रतिबद्धता दृढ़ और अटल. गठबंधन की सीमाओं और मजबूरियों के बावजूद जब भी उन्हें सही अवसर मिले उन्होंने जनहित की योजनाओं पर कार्य किया और उन्हें कुशलता से लागू कर नागरिकों को उनसे लाभान्वित किया जिन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया. अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लड़कियों के लिए साईकिल योजना, बीपीएल और समाज के निम्नतम तबकों के बालिकाओं के लिए कन्यादान योजना, बाल-विवाह और भ्रूण-हत्या रोकने तथा बालिका के समग्र कल्याण के लिए लाडली लक्ष्मी योजना, शहरी क्षेत्र के निर्धन परिवारों के लिए दाल-भात योजना कुछ ऐसे ही सामाजिक और राजकोषीय दृष्टि से संपुष्ट कार्यक्रमों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं.

और इस तरह उनकी राजनीतिक यात्रा जारी हैअविरल और अनवरत.औरमंजिल कोसों दूर.! पर हौसले बुलंद हैं और मजबूती से आगे बढ़ते रहने का और नए-नए मुकाम हासिल करते रहने का जज्बा बरक़रार है, क्योंकि

वो सुबह कभी तो आयेगी, वो सुबह कभी तो आयेगी

इन काली सदियों के सर से, जब रात का आँचल ढलकेगा

जब दुःख के बादल पिघलेंगे, जब सुख का सागर छलकेगा

जब अंबर झूम के नाचेगा, जब धरती नग्में गायेगी

वो सुबह कभी तो आयेगी!

 

अर्जुन मुंडा: एक दूरदर्शी स्वप्नद्रष्टा

समाज के उपेक्षित, शोषित वर्गों और जनजातीय लोगों की आवाज बनकर उनके जल, जंगल, जमीन की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक पटल पर पदार्पण करनेवाले श्री अर्जुन मुंडा जी की राजनीति जीवन और संपत्ति, वैयक्तिक स्वतंत्रता, और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे मूलभूत अधिकारों और मानवीय मूल्यों के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है. वे राजनीति को आम जनता को समर्थ बनाने हेतु एक सक्षम माध्यम की तरह देखते हैं; पूरे देश, विशेषकर झारखंड, के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के लिए एक अति उपयोगी और सशक्त उपकरण.

कालांतर में उन्होंने अपने चिंतन और विचारों को नई धार दी और अपने प्रिय प्रदेश झारखंड और उसके नागरिकों के लिए अपने विजन को एक ऐसे समेकित और ससमानाधिकार की स्वर्ग-भूमि के परिकल्पना से की जहाँ के स्वस्थ और शिक्षित निवासी प्रकृति की नैसर्गिक गोद में एक अविरल सानिध्य के साथ रहते हों; जहाँ प्राकृतिक और खनिज संसाधनों का दोहन और उपयोग उसके सजग और प्रबुद्ध नागरिकों के द्वारा बिल्कुल पारदर्शी और जिम्मेवाराना ढंग से पर्यावरण के अनुकूल नीतियों और तकनीक से होता हो; जहाँ के सैद्धांतिक धरातल पर अंत लाभ के लिए किसी अंधी-दौड़ की परंपरा न हो बल्कि अंत-परिणाम के निमित्त उपयोग में आनेवाले साधनों और संसाधनों के किस्म, स्वभाव, और गुणवत्ता पर बल दिया जाये जिससे प्रकृति की गोद संसाधनों से सर्वदा भरा रहे और उसका दैवीय सौंदर्य अक्षुण्ण बना रहे; जहाँ प्राकृतिक संपदा की तात्कालिक लूट के लिए निर्लज्ज बहशीपन और विध्वंसक शोषण की इजाजत न हो.

श्री मुंडा जी ने एक विकसित और समृद्ध झारखंड के अपने सपने को साकार करने के लिए पूर्णतया विकसित भौतिक और सामाजिक आधारभूत संरचना की अपरिहार्यता और महत्ता को भली-भांति समझा. उनकी योजना में पूरे प्रदेश के लिए सड़क नेटवर्क से एक अबाधित संपर्क व्यवस्था बनाने की है जो राजधानी से प्रारंभ होकर प्रदेश के जिलों और प्रखंडों को जोड़ते हुए गावं-गावं तक फैली हो क्योंकि सड़कें संपर्क के साधन के अलावा लोगों को व्यापार और बाज़ार से जोड़कर आर्थिक गतिविधियों को दिशा व गति देनेवाली जीवनदायनी रेखा का भी काम कर सकने में समर्थ हैं. अपने आवासीय खपत, कृषिभूमि की सिंचाई, और कारखानों के लिए उर्जा उत्पादन हेतु प्रदेश अपने क्षयशील और अक्षयशील प्राकृतिक और खनिजीय संसाधनों का उपयोग पूरी जिम्मेवारी से पर्यावरण को बिना हानि पहुंचाए करेगा. झारखंड को प्रचुर प्राकृतिक संपदा से संपन्न होने और औसतन वर्ष में 300 से भी अधिक दिनों तक चमकीले धूप से प्रदीप्त रहनेवाला प्रदेश होने का सौभाग्य प्राप्त है. परिणामस्वरूप झारखंड उर्जा उत्पादन के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर कार्य करेगा जो झारखंड को पावर सरप्लस राज्य बनाएगा और उर्जा को एक आर्थिक परिसंपत्ति की तरह संसाधित कर उसके व्यापार और विक्रय की व्यवस्था करेगा. टेलीफोन और ब्रॉडबैंड इंटरनेट के लिए एक मजबूत संचार व्यवस्था की स्थापना की जाएगी जिससे सामान्य, तकनीकि, और पेशेवर पाठ्यक्रमों से शिक्षा और चिकित्सीय सुविधाओं के नेटवर्क से स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक क्रांति का आगाज़ होगा. उद्देश्य था कि भौतिक आधारभूत संरचना का लाभ उठाकर सामाजिक बुनियादी ढांचे के मौलिक संघटकों – स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बैंक, व्यावसायिक प्रतिष्ठान इत्यादि – का निर्माण हो सके जो एक शिक्षित और सुविज्ञ समाज का जनक हो और जिसके नागरिक अपने विभिन्न आर्थिक गतिविधियों से अपने परिवार और अपने प्रदेश के लिए धन और संपन्नता पैदा कर सकें.

एक युवा प्रदेश जहाँ तरुणों की जनसँख्या लगभग 60 प्रतिशत हो उन्हें शिक्षित और कौशलपूर्ण बनाकर सरकार, वाणिज्य-व्यवसाय, और अन्य आर्थिक गतिविधियों में लगाकर विकास के स्वस्थ व तीव्र छलांग लगाते हुए जनांकिक लाभांश (डेमोग्राफिक डिविडेंड) लेना योजना का एक अहम हिस्सा होगा. परिणामतः झारखंड तेजी से विकास और आर्थिक संपन्नता के पायदानों पर चढ़कर भारत के अग्रणी राज्यों के कतार में गर्व से खड़ा हो सकेगा. श्री मुंडा जी के विजन की नवीनता और विलक्षणता उनके कुछ योजनाओं के भविष्यवादी चिंतन और उससे होनेवाले लाभ में परिलक्षित होते हैं.

अनुसूचित जाति एवं जनजाति की स्कूली बालिकाओं को साइकिल देना एक ऐसी ही योजना थी. श्री अर्जुन मुंडा शायद देश के पहले राजनेता थे जिन्होंने एक मामूली साइकिल की अदभुत क्षमता को पहचाना जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाओं के नामांकन में तेजी से इज़ाफा हुआ और उनके स्कूल छोड़ने की संख्या लगातार घटने लगी. स्कूली फासला और सुनसान इलाकों से गुजरने समय असुरक्षा का भय बालिकाओं के दो प्रमुख समस्याएं थीं जिसे साइकिल ने एक साथ दूर कर उन्हें गतिशीलता और सुरक्षा दी.

आईटीआई के द्वारा व्यावसायिक शिक्षा, औद्योगिक केन्द्रों के समीप आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स क्लस्टर, खूंटी और बोकारो में नॉलेज सिटी, प्रमुख भारतीय एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ आरंभिक समझौते इत्यादि सभी की परिकल्पना शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन केंद्रित उनके वृहत विजन के आवश्यक संघटकों के रूप में की गयी थी.

लाखों कुओं और हजारों चेकडैम का निर्माण राज्य के किसानों को एक फसलीय से बहु फसलीय बनाने के उद्देश्य से किया गया था जिससे प्रदेश के अनाज उत्पादन में तेजी से वृद्धि हो और किसानों की आमदनी बढ़े. ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की बढ़ती सम्पन्नता से स्थानीय वाणिज्य-व्यवसाय को बढ़ावा मिलने और खपत में वृद्धि होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था के सुचारू और स्वावलंबी रूप से चलने की संभावनाएं प्रबल हो सकती थीं.

मछलीपालन, मुर्गीपालन, डेयरी, हॉर्टिकल्चर, फ्लोरिकल्चर, सेरिकल्चर इत्यादि का विकास और संचालन के पीछे कृषि के विजन में परिपूरक भूमिका निभाते हुए उसे और वृहत बनाना था जिससे पूरे राज्य को कृषि और कृषितर योजनाओं और गतिविधिओं के पदचिन्हों से ढंका जा सके जिससे किसानों के साथ-साथ अकुशल श्रमिकों को भी रोजगार मिले और प्रदेश में आमदनी के नए-नए श्रोतों का सृजन हो. कृषितर योजनाओं में उद्योग उपक्रम से संबंधित एक नए बिज़नेस कल्चर के प्रस्फुटित होने की संभावनाएं भी छिपी हैं जिससे हजारों-लाखों युवाओं को राज्य में रोजगार के नए अवसर मिल सकते थे और प्रदेश को अधिक समृद्धि.

श्री अर्जुन मुंडा के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के विजन का एक और अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलु था ग्रामीण क्षेत्रों में शासन तंत्र का विकेन्द्रीकरण और पंचायती राज संस्थानों द्वारा जनता को सेवा-सुविधाओं की डिलीवरी.

अर्जुन मुंडा: एक प्रबुद्ध जन-हितैषी

अपने बचपन और किशोरावस्था के वर्षों में श्री अर्जुन मुंडा जी ने समाज के दबे-कुचले  और उपेक्षित जनजातीय लोगों के घोर अभाव, निर्धनता, और पक्षपात के राक्षसी आपदाओं को बहुत नजदीक से देखा था. भारतीय समाज का काला, रोगग्रस्त चेहरा और उसकी घिनौनी हक़ीकत जिसपर औपचारिक नज़ाकत का एक मुलम्मा चढ़ा था श्री मुंडा जी के युवा और कोमल ह्रदय पर एक ऐसा कुठाराघात था जिसे वो घोर अपमानजनक, पूर्णतया अनैतिक, और आत्मा तक को कंपा देनेवाली एक निर्मम सच्चाई मानते थे. उन्हें पूरी सामाजिक व्यवस्था बहुत ही घिनौना और भयानक लगता था. वर्षों से दिल के किसी कोने में बंद अपने ह्रदय के रीसते ज़ख्मों और दर्द के समुंदर को श्री मुंडा जी ने अपने जन-कल्याणकारी कार्यों के माध्यम से एक सकारात्मक निकास दिया, अपने जलजले को अभिव्यक्ति की एक रोशन राह दी.

श्री अर्जुन मुंडा जी जमशेदपुर क्षेत्र के दो गैर-सरकारी संस्थानों – आदिवासी वेलफेयर सोसाइटी (AWS) और आदिवासी वेलफेयर ट्रस्ट (AWT) से नजदीक से जुड़े हुए हैं – जो उन्नयन और उन्मूलन – जैसे दो शक्तिशाली सिद्धांतों पर काम करते हैं.

उन्नयन – सामाजिक-आर्थिक उन्नयन – साक्षरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, रोजगार प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास – जैसे क्षेत्रों पर बल देकर

उन्मूलन – सामाजिक विषमताओं का, पक्षपातपूर्ण भेद-भाव का, निर्धनों और जनजातीय समुदायों को ग्रसने वाली बीमारयों का

उनके गैर-सरकारी संस्थानों ने नेतृत्व-क्षमता और अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान की ग्लोबल यूथ नेटवर्क, AISEC के साथ समझौता किया है.  AISEC यूनिवर्सिटीज के माध्यम से कार्य करता है जिसके अंतर्गत वह सिविल सोसाइटी, गैर-सरकारी संस्थानों, तथा अन्य सामाजिक संस्थाओं के साथ पार्टनरशिप कर युवाओं को विभिन्न देशों में कुछ समय के लिए स्थापित करते हैं जहाँ उन्हें जमीनी स्तर पर कार्य करने और एक नए देश की जीवन-शैली व संस्कृति को देखने-समझने का अवसर प्राप्त होता है. AISEC के फेलोशिप और सांस्कृतिक आदान-प्रदान प्रोग्राम के अंतर्गत AWS और AWT के पास चीन, ब्रिटेन, मोर्रको, लेबनान, मिस्र व अन्य कई देशों के युवा आ चुके हैं. AWS और AWT के पदाधिकारी AISEC फेलो के खाने-पीने, रहने, और यातायात की सभी ज़रूरतों की जिम्मेवारी लेते हैं और सुदूर क्षेत्रों में उनके पूर्व-निर्धारित विभिन्न कार्यक्रमों और वर्कशॉप में संरक्षक बनकर साथ जाते हैं और उनकी सहूलियत और सुरक्षा को सुनिश्चित करते हैं. श्री मुंडा जी उनके साथ काफी वक़्त बिताते हैं, उनका कुशल-क्षेम पूछते हैं, उनके पूरे प्रवास के दौरान उनसे नजदीकी सम्पर्क बनाये रखते हैं, उन्हें अपने घर बुलाते रहते हैं, और अपने पारिवारिक एवं सामाजिक आयोजनों में भी आमंत्रित करते हैं ताकि उनका अल्प प्रवास हर तरह से आरामदेह रहे और उन्हें भारतीय संस्कृति और रीति-रिवाजों की सीधी जानकारी मिले.

श्री अर्जुन मुंडा जी को तीरंदाजी से बहुत लगाव है और वे उसके प्रचार और प्रगति में अत्यधिक अभिरुचि रखते हैं. खेल-कूद को वे उन्मुक्तता प्रदान करने का एक शशक्त माध्यम मानते हैं और सामर्थ्य संचन एवं व्यक्तित्व विकास के लिए एक अनमोल परिसंपत्ति, एक सुनहरा आयाम. खेल-कूद में समभाव पैदा करने का एक बेहतरीन सम्पुट विद्यमान होता है, एक जादुई शक्ति छिपी होती है जो हमारे जीवन को पूरी तरह से रूपांतरित कर सकता है. खिलाड़ियों को लोग बिना उनके धर्म, जाति, नस्ल और मान्यताओं की परवाह किये नायकों, शूरवीरों, और अनुकरणीय सूरमाओं की तरह प्यार करते हैं, पूजते और सराहते हैं. श्री मुंडा जी को खेलों की उस अदभुत और विलक्षण शक्ति और उसके समभाव दर्शन का पूर्ण ज्ञान है. वे तीरंदाजी के साथ एक संरक्षक और सलाहकार के तौर पर सक्रियता से जुड़े हुए हैं.

श्री मुंडा जी का सौभाग्य है कि उनकी पत्नि श्रीमती मीरा मुंडा जी भी तीरंदाजी की सक्रिय समर्थक हैं और पूरी प्रबलता से तीरंदाजी के प्रति समर्पित हैं जो झारखंड के ग्रामीण जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा है और इसकी संस्कृति में रचा-बसा है.

भारत के केन्द्रीय मंत्री श्री वेंकैय्या नायडू द्वारा सितम्बर 2014 में नई दिल्ली में आयोजित एक शानदार समारोह में “असोचम लेडीज लीग ग्रासरूट्स वीमेन ऑफ़ दी डिकेड अचीवर्स अवार्ड” से सम्मानित श्रीमती मीरा मुंडा एक गैर-सरकारी संस्था, खरसावां-सरायकेला जिला तीरंदाजी संघ की अध्यक्षा हैं जो तीरंदाजी की सुपरस्टार दीपिका कुमारी सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खिलाडियों का जनक रहा है. कुचाई सिल्क के क्षेत्र में उनका अनुकरणीय कार्य सरायकेला इलाके में घर-घर लोगों की ज़ुबान पर है. श्रीमती मुंडा ने सिल्क उत्पादन से जुड़े 6 हज़ार से भी अधिक महिला शिल्पी और श्रमिकों को पूर्ण अथवा आंशिक रोजगार मुहैया कराया है और उन्हें संरक्षण और सहायता पहुंचाई है. क्षेत्र की महिलाएं उन्हें अपनी गॉडमदर के रूप में प्यार और सम्मान करती हैं जिन्होंने उनके जीवन को बदलकर उसे सुखमय और अर्थपूर्ण बनाया है.

श्री अर्जुन मुंडा जी ने जनजातीय समुदायों के बीच प्रबलता से व्याप्त आनुवंशिक रक्त विकार, सिकल सेल अनीमिया (Sickle Cell Anaemia) का झारखंड और भारत से पूर्ण उन्मूलन के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना पर भी कार्य करना प्रारम्भ किया है. दस्तावेजों का सारा काम पूरा कर लिया गया है. विषयक विशेषज्ञों की टीम द्वारा शोधकार्य और डाटा एकत्र करने का काम चल रहा है. आशा है 2015 के आरम्भ में एक समर्पित गैर-सरकारी संस्था की औपचारिक घोषणा और लोकार्पण के साथ इस वजनी और महती योजना की नीँव रखी जाएगी.